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उपन्यास की कहानी पूर्वी जर्मनी की पृष्ठभूमि पर रची गयी है, जिसकी आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था मार्क्सवादी सिद्धान्तों पर आधारित थी। साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना के प्रयास में दमनकारी नीतियों का पालन हुआ जिससे भय का एक ऐसा वातावरण पैदा हुआ कि लोग डरे-सहमें रहते। गुलामों की तरह जिन्दगी जीते। किन्तु एक दिन जब जन-जन के मन में व्याप्त असन्तोष की आग भभक उठी, तब पूरी व्यवस्था जलकर राख हो गयी। कम्युनिस्ट शासन का अन्त हो गया। लोग स्वतन्त्र हो गये...। बर्लिन की दीवाल ढहने के बाद मची भगदड़ में हजारों परिवार बिखर गये। आल्फ्रेड की पत्नी का मनोरोग-चिकित्सा-संस्थान पहुँच जाना तथा आजादी की मशाल जलाने वाले जुर्गेन का जहर देकर मार दिया जाना, उस त्रासदी के बस उदाहरण मात्र थे...।
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