Shabdon Ka Desh

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Bol यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि सुप्रतिष्ठित कवि राकेश मिश्र का चतुर्थ काव्य-संग्रह शब्दों का देश प्रकाशित हो रहा है। इस संकलन में दो सौ के आस-पास कविताएं संकलित हैं, जो मिश्र जी के विकसित भाव-बोध और विश्व-बोध का सतर्क परिचय देती हैं। यहां कवि जिस तटस्थता से शब्दों एवं संवेदनाओं के संश्लेषण द्वारा जिंदगी और कविता को परस्पर अनुस्यूत करता है, उससे जीवन और जगत का वैविध्यपूर्ण-अनावृत यथार्थ पूरी मर्मस्पर्शिता तथा गहनता के साथ प्रस्तुत हुआ है। मिश्र जी अपने सुख-दुख, उदात्त प्रेम, जीवन-बोध, विश्व-बोध, उर्वर सहानुभूति, समय-समाज के बदलते संदर्भों, प्रकृति-पर्यावरण के प्रति चिंता और मानवीय सरोकारों को जिस मौलिकता और सहजता से चित्रित करते हैं, उससे इस संकलन की कविताएं एक विशिष्ट संवेदनात्मक गहराई और बौद्धिक उत्कर्ष प्राप्त करती हैं। इस संकलन का केन्द्रीय भाव-बोध और मूल प्रतिपाद्य यह है कि प्रकृति-पर्यावरण की तरह ही भौतिक-जीवन, वैयक्तिक अनुभव-स्मृतियाँ और वस्तु जगत मनुष्य की नियति को कैसे संचालित करता है तथा कैसे उसे घेरे रहता है, इसे आविष्कृत करने का दुष्कर और चुनौतीपूर्ण कार्य इस संग्रह की कविताओं द्वारा सम्पन्न हुआ है। इसमें प्रेम, सौंदर्य, आसपास के जीवनानुभव, गांव-शहर से लेकर वैश्विक घटनाओं तक का गत्यात्मक चित्रण हुआ है। शब्दों का देश अमानवीय स्थितियों के बीच मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने के प्रयास की अभिव्यक्ति है, जिसमें कवि की दुर्निवार आस्था, संघर्ष चेतना की सही पहचान और अनुभव जगत का वैविध्यपूर्ण समारोह उपस्थित हुआ है। इसमें कवि की लघु, सामान्य और लंबी कविताओं का मनोरम विन्यास, भावों की उत्कटता, चित्रण की सूक्ष्मता एवं जीवनानुभूति की गहनता के साथ एक विशिष्ट औदात्य और वैभव से सम्पन्न हैं जो एक बड़ी संभावना की ओर बढ़ रहे कवि का निदर्शन कराती हैं। इस दृष्टि से संग्रह की सारी कविताएँ बेहद पठनीय, चिंतनीय और पाठक को संवेदन एवं बौद्धिक धरातल पर समृद्ध करने वाली हैं। —डॉ.करुणाशंकरउपाध्****याय

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यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि सुप्रतिष्ठित कवि राकेश मिश्र का चतुर्थ काव्य-संग्रह शब्दों का देश प्रकाशित हो रहा है। इस संकलन में दो सौ के आस-पास कविताएं संकलित हैं, जो मिश्र जी के विकसित भाव-बोध और विश्व-बोध का सतर्क परिचय देती हैं। यहां कवि जिस तटस्थता से शब्दों एवं संवेदनाओं के संश्लेषण द्वारा जिंदगी और कविता को परस्पर अनुस्यूत करता है, उससे जीवन और जगत का वैविध्यपूर्ण-अनावृत यथार्थ पूरी मर्मस्पर्शिता तथा गहनता के साथ प्रस्तुत हुआ है। मिश्र जी अपने सुख-दुख, उदात्त प्रेम, जीवन-बोध, विश्व-बोध, उर्वर सहानुभूति, समय-समाज के बदलते संदर्भों, प्रकृति-पर्यावरण के प्रति चिंता और मानवीय सरोकारों को जिस मौलिकता और सहजता से चित्रित करते हैं, उससे इस संकलन की कविताएं एक विशिष्ट संवेदनात्मक गहराई और बौद्धिक उत्कर्ष प्राप्त करती हैं। इस संकलन का केन्द्रीय भाव-बोध और मूल प्रतिपाद्य यह है कि प्रकृति-पर्यावरण की तरह ही भौतिक-जीवन, वैयक्तिक अनुभव-स्मृतियाँ और वस्तु जगत मनुष्य की नियति को कैसे संचालित करता है तथा कैसे उसे घेरे रहता है, इसे आविष्कृत करने का दुष्कर और चुनौतीपूर्ण कार्य इस संग्रह की कविताओं द्वारा सम्पन्न हुआ है। इसमें प्रेम, सौंदर्य, आसपास के जीवनानुभव, गांव-शहर से लेकर वैश्विक घटनाओं तक का गत्यात्मक चित्रण हुआ है। शब्दों का देश अमानवीय स्थितियों के बीच मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने के प्रयास की अभिव्यक्ति है, जिसमें कवि की दुर्निवार आस्था, संघर्ष चेतना की सही पहचान और अनुभव जगत का वैविध्यपूर्ण समारोह उपस्थित हुआ है। इसमें कवि की लघु, सामान्य और लंबी कविताओं का मनोरम विन्यास, भावों की उत्कटता, चित्रण की सूक्ष्मता एवं जीवनानुभूति की गहनता के साथ एक विशिष्ट औदात्य और वैभव से सम्पन्न हैं जो एक बड़ी संभावना की ओर बढ़ रहे कवि का निदर्शन कराती हैं। इस दृष्टि से संग्रह की सारी कविताएँ बेहद पठनीय, चिंतनीय और पाठक को संवेदन एवं बौद्धिक धरातल पर समृद्ध करने वाली हैं। —डॉ.करुणाशंकरउपाध्****याय


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  • 9789391950071
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