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मिसरा उठा लो तुम गर तो ग़ज़ल ये मुकम्मल हो जाए' 'अन सुलझे मसले हैं अधूरी ज़िन्दगी के सारे हल हो जाए ' मिसरे' जब एक दूसरे का हाथ पकड़कर साथ चलते है तो इक दुनिया ज़ाहिर होती है, इक अहवाल-ए-'आलम बयां होता हैं, जिसमे तमाम वो जज़्बात, तमाम वो फ़लसफ़ा-दानी होती हैं जो बस इक शा'इर ही वाज़ेह कर सकता हैं । ग़ैर-शा'इराना तबियत यूं तो कोई गुनाह नहीं, लेकिन ज़ेहन-ओ-जज़्बात का फ़लसफ़ा इक सुख़न-आरा जिस खूबसूरती और मुअस्सिर अंदाज़ से पढ़ने या सुनने वालों के ज़ेहन में उतारता हैं, उसकी शायद ही कोई और मिसाल हो । उर्दू तहज़ीब और अदबिय्यात की कायनात में प्रस्तुत किताब एक मुक्कमल कहकशाँ होने का कतई दावा नहीं करती , लेकिन सितारा-ए-उम्मीद होने की चाह ज़रूर रखती हैं । वली दक्कनी, मीर, गालिब, फ़िराक, फ़ैज़ जैसे बेशुमार आफ़ताबो से इक अदना सी रोशनी की किरण लेकर अपने अरमानों की लौ को रौशन करने की जुर्रत का नाम ' सरगोशियाँ ' हैं ।
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