Sampoorn Kavitayein : Om Prakash Valmiki

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Bol ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएँ एक ओर दलित समाज के वेदना, अपमान और यातना से भरे जीवन-अनुभवों का मार्मिक दस्तावेज हैं तो दूसरी तरफ वर्ण और जाति के नाम पर थोपी गई अपात्रता और वंचन के विरुद्ध प्रतिवाद का तप्त स्वर। ये कविताएँ आक्रोशभरा आह्वान हैं कि भारतीय समाज में हजारों सालों से जारी वर्चस्ववादी-ब्राह्मणवादी व्यवस्था को तत्काल खत्म कर देना चाहिए, क्योंकि यह व्यवस्था बराबरी पर आधारित मानवीय समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है। वास्तव में ये कविताएँ बाबा साहब आम्बेडकर के उस विचार का सृजनात्मक प्रसार हैं, जिसमें उन्होंने कहा था—“हमारे जीवन-मूल्य और सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने के लिए दलित साहित्यकारों को जागरूक और प्रयत्नशील हो जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में साहित्यकारों का मैं आह्वान करता हूँ कि वे विभिन्न साहित्यिक विधाओं के द्वारा उदात्त जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों को रेखांकित करें। अपने लक्ष्य को मर्यादा में मत बाँधो, उसे और अधिक विशाल बनने दो। वाणी का विस्तार करो। अपनी लेखनी को केवल अपने प्रश्नों तक सीमित मत रखो। उसे तेजस्वी बनाओ जिससे गाँव में फैला अन्धकार दूर हो सके। यह मत भूलो कि इस भारत देश में उपेक्षित दलितों का बहुत बड़ा विश्व है। अपनी रचनाओं द्वारा उनकी वेदना को समझकर उनके जीवन को उज्ज्वल बनाने की कोशिश करो। यही मानवता की सचाई है।” कहना न होगा कि अपने एक-एक शब्द से, उत्पीड़ित मनुष्यता की तरफदारी करती, वाल्मीकि की कविताएँ उनकी रचनात्मकता की उपलब्धि तो हैं ही, हिन्दी कविता की भी उपलब्धि हैं।

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ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएँ एक ओर दलित समाज के वेदना, अपमान और यातना से भरे जीवन-अनुभवों का मार्मिक दस्तावेज हैं तो दूसरी तरफ वर्ण और जाति के नाम पर थोपी गई अपात्रता और वंचन के विरुद्ध प्रतिवाद का तप्त स्वर। ये कविताएँ आक्रोशभरा आह्वान हैं कि भारतीय समाज में हजारों सालों से जारी वर्चस्ववादी-ब्राह्मणवादी व्यवस्था को तत्काल खत्म कर देना चाहिए, क्योंकि यह व्यवस्था बराबरी पर आधारित मानवीय समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है। वास्तव में ये कविताएँ बाबा साहब आम्बेडकर के उस विचार का सृजनात्मक प्रसार हैं, जिसमें उन्होंने कहा था—“हमारे जीवन-मूल्य और सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने के लिए दलित साहित्यकारों को जागरूक और प्रयत्नशील हो जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में साहित्यकारों का मैं आह्वान करता हूँ कि वे विभिन्न साहित्यिक विधाओं के द्वारा उदात्त जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक मूल्यों को रेखांकित करें। अपने लक्ष्य को मर्यादा में मत बाँधो, उसे और अधिक विशाल बनने दो। वाणी का विस्तार करो। अपनी लेखनी को केवल अपने प्रश्नों तक सीमित मत रखो। उसे तेजस्वी बनाओ जिससे गाँव में फैला अन्धकार दूर हो सके। यह मत भूलो कि इस भारत देश में उपेक्षित दलितों का बहुत बड़ा विश्व है। अपनी रचनाओं द्वारा उनकी वेदना को समझकर उनके जीवन को उज्ज्वल बनाने की कोशिश करो। यही मानवता की सचाई है।” कहना न होगा कि अपने एक-एक शब्द से, उत्पीड़ित मनुष्यता की तरफदारी करती, वाल्मीकि की कविताएँ उनकी रचनात्मकता की उपलब्धि तो हैं ही, हिन्दी कविता की भी उपलब्धि हैं।


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Merk RADHA KRISHNA PRAKASAN PVT LTD
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  • 9788119989904
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