Rekhte Ke Beej Aur Anya Kavitayen (1990 2020)

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Bol हिन्दी कविता के परिदृश्य में कृष्ण कल्पित की जगह एकदम अलग और विशिष्ट है। बहैसियत कवि उन्हें जितनी चिन्ता अपने समय और समाज की है, उतने ही गम्भीर वे नागरिक परिसर में कविता के स्थान, उसकी भूमिका और व्यक्तित्व को लेकर भी बराबर रहते हैं। भाषा और भाषिक साहस के धनी ऐसे कम ही रचनाकार आज हमारे सामने हैं। बकौल देवी प्रसाद मिश्र, ‘दुस्साहस, असहमति, आवेश, अन्वेषण, पुकार, आह, ताक़त का विरोध, शिल्प-वैविध्य, नैतिक जासूसी और बाजदफ़ा पॉलिटिकली इनकरेक्ट—इस सबने मिलकर कृष्ण कल्पित को हमारे समय का सबसे विकट काव्य-व्यक्तित्व बना दिया है।’ इस संग्रह में शामिल कविता ‘रेख़्ते के बीज’, अगर अन्य कविताओं को फ़िलहाल न भी देखें, तो अकेली ही उनके सामर्थ्य को रेखांकित करने के लिए काफ़ी है। शिव किशोर तिवारी के अनुसार, ‘आगामी समयों में 'रेख़्ते के बीज’ को उत्तर-आधुनिकता की प्रतिनिधि कविता के रूप में उद्धृत किया जाएगा। शंभु गुप्त का कहना है कि ‘उनके अलावा अन्य कोई कवि इतिहास को इतने मौजूँ तरीक़े से पुनराख्यायित नहीं कर पाता जैसा उन्होंने सम्भव किया है।’ स्वीकृति और अस्वीकृति की पतली रेखा पर चलते हुए वे अकसर अपनी मेधा और निर्भीकता से समकालीन साहित्य-जगत को विचलित भी करते हैं, लेकिन उनकी कविता हर आपत्ति से बड़ी ही सिद्ध होती है। युवा कवि अविनाश मिश्र के शब्दों में, ‘एक योग्य कवि की उपेक्षा उसे पराक्रमी बनाती चलती है। कृष्ण कल्पित ने शिल्प से आक्रान्त और शब्द से आडम्बर किए बग़ैर हिन्दी कविता में एक असन्तुलन पैदा किया है। उनकी कविता पूरब की कविता की नई प्रस्तावना है।'

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हिन्दी कविता के परिदृश्य में कृष्ण कल्पित की जगह एकदम अलग और विशिष्ट है। बहैसियत कवि उन्हें जितनी चिन्ता अपने समय और समाज की है, उतने ही गम्भीर वे नागरिक परिसर में कविता के स्थान, उसकी भूमिका और व्यक्तित्व को लेकर भी बराबर रहते हैं। भाषा और भाषिक साहस के धनी ऐसे कम ही रचनाकार आज हमारे सामने हैं। बकौल देवी प्रसाद मिश्र, ‘दुस्साहस, असहमति, आवेश, अन्वेषण, पुकार, आह, ताक़त का विरोध, शिल्प-वैविध्य, नैतिक जासूसी और बाजदफ़ा पॉलिटिकली इनकरेक्ट—इस सबने मिलकर कृष्ण कल्पित को हमारे समय का सबसे विकट काव्य-व्यक्तित्व बना दिया है।’ इस संग्रह में शामिल कविता ‘रेख़्ते के बीज’, अगर अन्य कविताओं को फ़िलहाल न भी देखें, तो अकेली ही उनके सामर्थ्य को रेखांकित करने के लिए काफ़ी है। शिव किशोर तिवारी के अनुसार, ‘आगामी समयों में 'रेख़्ते के बीज’ को उत्तर-आधुनिकता की प्रतिनिधि कविता के रूप में उद्धृत किया जाएगा। शंभु गुप्त का कहना है कि ‘उनके अलावा अन्य कोई कवि इतिहास को इतने मौजूँ तरीक़े से पुनराख्यायित नहीं कर पाता जैसा उन्होंने सम्भव किया है।’ स्वीकृति और अस्वीकृति की पतली रेखा पर चलते हुए वे अकसर अपनी मेधा और निर्भीकता से समकालीन साहित्य-जगत को विचलित भी करते हैं, लेकिन उनकी कविता हर आपत्ति से बड़ी ही सिद्ध होती है। युवा कवि अविनाश मिश्र के शब्दों में, ‘एक योग्य कवि की उपेक्षा उसे पराक्रमी बनाती चलती है। कृष्ण कल्पित ने शिल्प से आक्रान्त और शब्द से आडम्बर किए बग़ैर हिन्दी कविता में एक असन्तुलन पैदा किया है। उनकी कविता पूरब की कविता की नई प्रस्तावना है।'


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  • 9789393768391
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