Raja Momo Aur Peelee Bulbul

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Bol गोवा भारत का सबसे छोटा प्रान्त है। इसका क्षेत्रफल मात्र 3,702 वर्गमील है और यह दो जिलों का प्रान्त है—उत्तरी गोवा और दक्षिणी गोवा। अरब सागर, मनोहारी जंगल, छोटे-छोटे अनूप पहाड़, काजू के सघन बगीचे, प्रसिद्ध मद्य फ़ेनी, दूर-दूर तक फैले धान के खेत, हमेशा आनन्द से छलकते समुद्र-तट और देश-विदेश के पर्यटकों से सुसज्जित इस नन्हे प्रान्त की शक्ल बाहर से जगमग ‘परी-लोक’ सरीखी है। पर इसकी आत्मा आज भी गहरे अवसाद में है। 1947 में भारत की आज़ादी के बावजूद अगले 14 वर्षों तक गोवा पुर्तगाली शासन में रहा और एक लम्बे मुक्ति संग्राम के बाद इसे 1961 में स्वतंत्रता मिल सकी। पर गोवा को आज तक अपनी विडम्बनाओं से मुक्ति नहीं। इस स्थायी अवसाद की स्थिति में छोटे क़द-बुतवाले गोवा का वज़न बेहिसाब बढ़ चुका है। अत्यधिक वज़न की समस्या से जूझते गोवा का स्थान वज़न के मामले में भारत के अन्य सभी प्रान्तों से ऊपर है। प्राचीन काल से परम्परावादी इस प्रान्त को निरन्तर सामाजिक-सांस्कृतिक पतन ने भीतर से क्षयग्रस्त कर रखा है। ज़माने से वैश्विक अय्याशी का केन्द्र रहा गोवा खनन माफ़िया, ड्रग माफ़िया, गोवा को कंक्रीट का जंगल बनानेवाले भवन माफ़िया और वन-माफ़िया के करतबों से चुपचाप ख़ून के आँसू टपका रहा है। हिन्दी साहित्य में गोवा सदैव से हाशिये पर रहा है। पहली बार हिन्दी साहित्य में गोवा को लेकर बड़े फ़लक पर लिखा गया यह बृहत् उपन्यास देश के सबसे छोटे प्रान्त को केन्द्रीय विमर्श में लाने की पेशकश करता है।

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गोवा भारत का सबसे छोटा प्रान्त है। इसका क्षेत्रफल मात्र 3,702 वर्गमील है और यह दो जिलों का प्रान्त है—उत्तरी गोवा और दक्षिणी गोवा। अरब सागर, मनोहारी जंगल, छोटे-छोटे अनूप पहाड़, काजू के सघन बगीचे, प्रसिद्ध मद्य फ़ेनी, दूर-दूर तक फैले धान के खेत, हमेशा आनन्द से छलकते समुद्र-तट और देश-विदेश के पर्यटकों से सुसज्जित इस नन्हे प्रान्त की शक्ल बाहर से जगमग ‘परी-लोक’ सरीखी है। पर इसकी आत्मा आज भी गहरे अवसाद में है। 1947 में भारत की आज़ादी के बावजूद अगले 14 वर्षों तक गोवा पुर्तगाली शासन में रहा और एक लम्बे मुक्ति संग्राम के बाद इसे 1961 में स्वतंत्रता मिल सकी। पर गोवा को आज तक अपनी विडम्बनाओं से मुक्ति नहीं। इस स्थायी अवसाद की स्थिति में छोटे क़द-बुतवाले गोवा का वज़न बेहिसाब बढ़ चुका है। अत्यधिक वज़न की समस्या से जूझते गोवा का स्थान वज़न के मामले में भारत के अन्य सभी प्रान्तों से ऊपर है। प्राचीन काल से परम्परावादी इस प्रान्त को निरन्तर सामाजिक-सांस्कृतिक पतन ने भीतर से क्षयग्रस्त कर रखा है। ज़माने से वैश्विक अय्याशी का केन्द्र रहा गोवा खनन माफ़िया, ड्रग माफ़िया, गोवा को कंक्रीट का जंगल बनानेवाले भवन माफ़िया और वन-माफ़िया के करतबों से चुपचाप ख़ून के आँसू टपका रहा है। हिन्दी साहित्य में गोवा सदैव से हाशिये पर रहा है। पहली बार हिन्दी साहित्य में गोवा को लेकर बड़े फ़लक पर लिखा गया यह बृहत् उपन्यास देश के सबसे छोटे प्रान्त को केन्द्रीय विमर्श में लाने की पेशकश करता है।


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  • 9789393768483
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