Mokshawan
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वृन्दावन को कृष्ण की क्रीड़ा-स्थली के रूप में जाना जाता है। श्रद्धा**,** भक्ति और समर्पण का यह केन्द्र वर्षों से न सिर्फ़ भारत बल्कि दुनिया-भर के कृष्ण-प्रेमियों को आकर्षित करता आ रहा है। लेकिन इस धार्मिक नगरी का एक पक्ष और है**—यहाँ रहनेवाली विधवाएँ और उनका त्रासद जीवन। देश-भर से वे स्त्रियाँ जिन्हें विधवा हो जाने के बाद अपने घर या ससुराल,** कहीं भी ठिकाना नहीं मिलता**,** वे वृन्दावन चली आती हैं। वे चाहे जिस आयु की हों। प्रतिष्ठित कथाकार और अपने हर उपन्यास के लिए व्यापक अध्ययन करनेवाले भगवानदास मोरवाल ने ‘मोक्षवन’ में इसी विषय को उठाया है। इसके लिए उन्होंने वृन्दावन में काफ़ी समय भी बिताया और सम्बन्धित सामग्री की खोज-बीन की। इस कथाकृति में आज के वृन्दावन**,** उसके मन्दिरों**,** परम्पराओं**,** गलियों-मुहल्लों**,** देवस्थानों आदि का एक विराट दृश्य रचते हुए**,** वे विधवाओं के दैनिक दुखों**,** जीवन-चर्या**,** वृन्दावन के धािर्मक वातावरण में उनकी दृश्यता का एक प्रामाणिक और मार्मिक चित्र प्रस्तुत करते हैं। कहानी कोलकाता से आई युवा विधवा हरिदासी की है**,** जो मोक्ष की इस यात्रा में अत्यन्त दुख सहन करते हुए अन्तत: संसार को विदा कह देती है और भारतीय संस्कृति से जुड़े कई ऐसे सवालों को उठा जाती है जिन पर हमारा समाज अकसर मौन रहता है। वृंदावन के साथ-साथ इस उपन्यास में बंगाल की लाल सौंधी मिट्टी की महक और कपास के सफ़ेद फूलों की कोमल बेचैनी भी रह-रहकर पाठक को उद्वेलित करती है।
वृन्दावन को कृष्ण की क्रीड़ा-स्थली के रूप में जाना जाता है। श्रद्धा**,** भक्ति और समर्पण का यह केन्द्र वर्षों से न सिर्फ़ भारत बल्कि दुनिया-भर के कृष्ण-प्रेमियों को आकर्षित करता आ रहा है। लेकिन इस धार्मिक नगरी का एक पक्ष और है**—यहाँ रहनेवाली विधवाएँ और उनका त्रासद जीवन। देश-भर से वे स्त्रियाँ जिन्हें विधवा हो जाने के बाद अपने घर या ससुराल,** कहीं भी ठिकाना नहीं मिलता**,** वे वृन्दावन चली आती हैं। वे चाहे जिस आयु की हों। प्रतिष्ठित कथाकार और अपने हर उपन्यास के लिए व्यापक अध्ययन करनेवाले भगवानदास मोरवाल ने ‘मोक्षवन’ में इसी विषय को उठाया है। इसके लिए उन्होंने वृन्दावन में काफ़ी समय भी बिताया और सम्बन्धित सामग्री की खोज-बीन की। इस कथाकृति में आज के वृन्दावन**,** उसके मन्दिरों**,** परम्पराओं**,** गलियों-मुहल्लों**,** देवस्थानों आदि का एक विराट दृश्य रचते हुए**,** वे विधवाओं के दैनिक दुखों**,** जीवन-चर्या**,** वृन्दावन के धािर्मक वातावरण में उनकी दृश्यता का एक प्रामाणिक और मार्मिक चित्र प्रस्तुत करते हैं। कहानी कोलकाता से आई युवा विधवा हरिदासी की है**,** जो मोक्ष की इस यात्रा में अत्यन्त दुख सहन करते हुए अन्तत: संसार को विदा कह देती है और भारतीय संस्कृति से जुड़े कई ऐसे सवालों को उठा जाती है जिन पर हमारा समाज अकसर मौन रहता है। वृंदावन के साथ-साथ इस उपन्यास में बंगाल की लाल सौंधी मिट्टी की महक और कपास के सफ़ेद फूलों की कोमल बेचैनी भी रह-रहकर पाठक को उद्वेलित करती है।
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