माधोपुर का घर उपन्यास लगभग सौ साल यानी तीन पीढ़ियों की कहानी कहता है जिसके माध्यम से उत्तर बिहार का सामाजिक यथार्थ जानने को मिलता है। राजनीति बिलकुल अन्तर्धारा सी चलती है। ...चूँकि एक सम्पन्न खेतिहर गाँव की कहानी है सो उसके ह्रास की बात स्वतः ही कह जाती है। शिक्षण-प्रशिक्षण तथा कृषिकार्य से सीधे जुड़े, प्रशासन को बरतनेवाले की ज़ुबान से निकला सब कुछ सत्य प्रतीत होता है। **—**उषाकिरण खान माधोपुर का घर उस जीवन और सचाई की तलाश है जिसे उपन्यास या कहानी के साँचे में नहीं ढाला जा सकता। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सचाई पर ‘फॉर्म’ का दबाव उसके प्रभाव को कम करता है। यही वजह है कि त्रिपुरारि बात कहने पर ज़ोर देते हैं उसके आगे-पीछे कल्पना या उसे प्रामाणिक बनाने के लिए कोई जाल नहीं बुनते। दरअसल जीवन अपने आप में इतना कलात्मक है कि उस पर ‘सचाई’ की कोई और परत चढ़ाई नहीं जा सकती। ‘माधोपुर का घर’ भी सचाई की ऐसी सरल दास्तान है जो बिना ‘बैसाखियों’ के सहारे सीधे पाठक तक पहुँची है। **—**असग़र वजाहत माधोपुर का घर अनेक घरों की बेघरी का उपन्यास है। विस्थापन की पीड़ा का उपन्यास है। उपन्यास की कहानी एक कुत्ते की ज़ुबानी सुनाई जा रही है जो इस उथल-पुथल का मूक गवाह बना रहा। सबसे अधिक पीड़ा भोगता रहा। एक अनूठी कथा शैली में लिखी पीढ़ी-पीढ़ी बिखरते परिवार की कहानी। —प्रभात रंजन
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