'मैं इश्क़ लिखना चाहूँ' ये क़िताब एक आवाज़ है । आवाज़ ख़ुद की जो कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाई ! अधूरे किस्से, कुछ अधूरे ख़्वाब, कुछ अधूरे प्रेमी जिनका मिलना सिर्फ इन कविताओं में ही मुमकिन है । इश्क़ पाने की हिम्मत नहीं सिर्फ खोने का एहसास ज़िंदा रखती है ये क़िताब ।
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