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Bol ग्लोबल गाँव के देवता आदिवासी जनजीवन की ज्वलन्त गाथा है। असुर आदिवासी समुदाय को केन्द्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास उनकी लगातार बढ़ रही मुश्किलों का बयान करते हुए वर्तमान भारतीय समाज, संस्कृति, सियासत और सत्ता प्रतिष्ठान के सामने कई प्रासंगिक प्रश्न खड़े करता है। ये असुर आदिवासी ही हैं जिन्होंने आग और धातु की खोज की, धातु को गलाकर औजार बनाया। मानव सभ्यता और संस्कृति को आगे बढ़ाने में उनका योगदान किसी व्याख्या का मोहताज नहीं है लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि आज उन्हें अवरोध समझा जा रहा है? तमाम परिस्थितियों का सामना करते हुए हज़ारों सालों से जीवित रहते आए आदिवासी समुदायों के अस्तित्व पर आज संकट क्यों मंडरा रहा है? वस्तुतः यह उपन्यास हमारी सभ्यता-संस्कृति के उस अँधेरे अन्तराल को उजागर करता है जहाँ समाज के छोटे प्रभावी हिस्से द्वारा समाज के अधिकतर सामान्य हिस्से के लोगों को उनकी ज़मीन से उखाड़ने, उन्हें साधनहीन बनाने को ही ‘विकास’ माना जाता है। इसमें भी विडम्बना यह कि ख़ुद को मुख्यधारा कहने वाला प्रभावी हिस्सा यह कार्य सामान्य हिस्से की भलाई के नाम पर करता है। असुर आदिवासियों के सन्दर्भ में इस मुख्यधारा के नज़रिये का हवाला इस प्रकार है कि अतीत की अनगिनत किंवदन्तियाँ और मिथक उनके संहार की कथाओं से भरे पड़े हैं, तो वर्तमान में उनके पारम्परिक इलाकों की ज़मीन में दबे खनिजों के लिए उन्हें वहाँ से बेदख़ल किया जा रहा है। इस उपन्यास की कथा यूँ तो झारखंड की पृष्ठभूमि में रची गई है लेकिन यह दुनिया के उन तमाम लोगों के जीवन संघर्ष का प्रतीक प्रतीत होती है जो अपनी ज़मीन, अपनी आबोहवा को बचाने के लिए लड़ रहे हैं।

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ग्लोबल गाँव के देवता आदिवासी जनजीवन की ज्वलन्त गाथा है। असुर आदिवासी समुदाय को केन्द्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास उनकी लगातार बढ़ रही मुश्किलों का बयान करते हुए वर्तमान भारतीय समाज, संस्कृति, सियासत और सत्ता प्रतिष्ठान के सामने कई प्रासंगिक प्रश्न खड़े करता है। ये असुर आदिवासी ही हैं जिन्होंने आग और धातु की खोज की, धातु को गलाकर औजार बनाया। मानव सभ्यता और संस्कृति को आगे बढ़ाने में उनका योगदान किसी व्याख्या का मोहताज नहीं है लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि आज उन्हें अवरोध समझा जा रहा है? तमाम परिस्थितियों का सामना करते हुए हज़ारों सालों से जीवित रहते आए आदिवासी समुदायों के अस्तित्व पर आज संकट क्यों मंडरा रहा है? वस्तुतः यह उपन्यास हमारी सभ्यता-संस्कृति के उस अँधेरे अन्तराल को उजागर करता है जहाँ समाज के छोटे प्रभावी हिस्से द्वारा समाज के अधिकतर सामान्य हिस्से के लोगों को उनकी ज़मीन से उखाड़ने, उन्हें साधनहीन बनाने को ही ‘विकास’ माना जाता है। इसमें भी विडम्बना यह कि ख़ुद को मुख्यधारा कहने वाला प्रभावी हिस्सा यह कार्य सामान्य हिस्से की भलाई के नाम पर करता है। असुर आदिवासियों के सन्दर्भ में इस मुख्यधारा के नज़रिये का हवाला इस प्रकार है कि अतीत की अनगिनत किंवदन्तियाँ और मिथक उनके संहार की कथाओं से भरे पड़े हैं, तो वर्तमान में उनके पारम्परिक इलाकों की ज़मीन में दबे खनिजों के लिए उन्हें वहाँ से बेदख़ल किया जा रहा है। इस उपन्यास की कथा यूँ तो झारखंड की पृष्ठभूमि में रची गई है लेकिन यह दुनिया के उन तमाम लोगों के जीवन संघर्ष का प्रतीक प्रतीत होती है जो अपनी ज़मीन, अपनी आबोहवा को बचाने के लिए लड़ रहे हैं।


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  • 9789360864705
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