इस संग्रह को पढ़ कर आपको ये महसूस होगा कि हर कविता अधूरी है पर ऐसा ज़रूरी नहीं है। सब कुछ पाठकों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। ऐसा स्वतः हो गया है कि जानबूझकर, इसका अनुमान मैं स्वयं नहीं लगा पा रहा हूँ।अधूरा है मन......
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