साहित्य आमतौर पर जीवन और समय के उन क्षणों को दर्ज करता है जो इतिहास की निगाह में अक्सर नहीं आते, या इतिहास की परम्परागत अवधारणा उन्हें अपने पन्नों पर अंकित करने लायक नहीं मानती। वे क्षण, जो अगर अनचीन्हे ही लुप्त हो जाएँ तो बहुत महत्त्वपूर्ण कुछ हमसे हमेशा के लिए छूट जाता है, साहित्य उन्हें संरक्षित करता है। साथ ही कई बार वह उन आख्यानों, और लोक-स्मृति का हिस्सा बन चुके तथ्यों को भी अपना विषय बनाता है जो प्राथमिक तौर पर इतिहास का विषय होते हैं, और किसी समय-विशेष को जानने में इतिहास के लिए भी उपयोगी होते हैं। इसीलिए अब इतिहास के अध्ययन में अन्य दस्तावेजों के साथ-साथ साहित्यिक स्रोतों की अहमियत पर भी जोर दिया जाने लगा है जिनसे इतिहास को न सिर्फ किसी एक घटना को अन्य कई पहलुओं से जानने, बल्कि अपनी दृष्टि का विस्तार करने के लिए भी जरूरी सामग्री मिल सकती है। हिन्दी में उपन्यासों ने यह काम बखूबी किया है। बीसवीं सदी में अनेक ऐसे उपन्यास लिखे गए जिनमें अपने समय की राजनीति को तत्कालीन सामाजिक सन्दर्भों के साथ अंकित किया गया। आधुनिक भारत का ऐतिहासिक यथार्थ में ऐसे ही उपन्यासों को आधार बनाकर 1919 से लेकर 1962 तक की भारतीय राजनीति को समझने की कोशिश की गई है। यह पुस्तक इन तीनों घटकों के अन्तर्सम्बन्धों को जानने की एक प्रविधि भी निर्मित करती चलती है। इस अध्ययन में उन्हीं उपन्यासों को रखा गया है जिनमें स्वतंत्रता आन्दोलन के इस शिखर-काल, गांधी और आजादी के बाद नेहरू के युग को गम्भीरतापूर्वक देखा, समझा और प्रस्तुत किया गया है। भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर और यशपाल सरीखे लेखकों के साथ इसीलिए यहाँ गुरुदत्त के उपन्यास भी विचारणीय रहे, जिनको पढ़ना हिन्दू-राष्ट्र के नैरेटिव को समझने के लिए आज और जरूरी है।
Prijshistorie
* Prijshistorie bevat geen data van Amazon.
Prijzen voor het laatst bijgewerkt op: