Aansu Aur Raushani : Alok Dhanwa Se Samvad

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Bol कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी की पुस्तक ‘आँसू और रौशनी’ दरअस्ल दो कवियन की वार्ता है। यह रूखा-सूखा साक्षात्कार नहीं, वरन् दो संवेदनशील सृजनधर्मियों का संवाद है; जिसमें हम अपने प्रिय साथी कलाकार से वह सब बाँट लेना चाहते हैं, जो हमें रसज्ञ की तरह अभिभूत करता है। आलोकधन्वा जैसे ख़ामोश कवि को थोड़ा-बहुत खोलना भी धैर्य, धृति और साधना की माँग करता है। पंकज ने वे एकान्त क्षण पकड़े, जब आलोक संवाद की सृजन-चेतना में जाग्रत थे। उनकी वह भीगी भावप्रवण आवाज़ इस पुस्तक में सुनाई दे रही है, जो घास के एक तिनके का भी कम्पन पहचान लेती है। पंकज चतुर्वेदी आलोकधन्वा की विह्वलता, वाग्वैभव और तरलता को ज्यों-का-त्यों हम तक लेकर आए हैं इस अनूठी पुस्तक में। संवाद दो कवियों का परस्पर मिलना भी है और खुलना भी। वे जीवन-संग्राम से बच नहीं रहे, उसी में रहते हुए रच रहे हैं। पंकज चतुर्वेदी की युवा उत्कंठाओं को पहचानते हुए आलोकधन्वा उन्हें अपने सृजन-कक्ष की मेज़ तक ले जाकर दिखा देते हैं और कहते हैं, “अच्छे लोग वही हुए, जो अन्याय के ख़िलाफ़ लड़े, उनसे ख़ूबसूरत कोई नहीं है।” एक ऐसे समय में, जब संवाद मन्थर पड़ रहा है, ‘आँसू और रौशनी’ के प्रकाशन का स्वागत है। —ममता कालिया, कथाकार

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कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी की पुस्तक ‘आँसू और रौशनी’ दरअस्ल दो कवियन की वार्ता है। यह रूखा-सूखा साक्षात्कार नहीं, वरन् दो संवेदनशील सृजनधर्मियों का संवाद है; जिसमें हम अपने प्रिय साथी कलाकार से वह सब बाँट लेना चाहते हैं, जो हमें रसज्ञ की तरह अभिभूत करता है। आलोकधन्वा जैसे ख़ामोश कवि को थोड़ा-बहुत खोलना भी धैर्य, धृति और साधना की माँग करता है। पंकज ने वे एकान्त क्षण पकड़े, जब आलोक संवाद की सृजन-चेतना में जाग्रत थे। उनकी वह भीगी भावप्रवण आवाज़ इस पुस्तक में सुनाई दे रही है, जो घास के एक तिनके का भी कम्पन पहचान लेती है। पंकज चतुर्वेदी आलोकधन्वा की विह्वलता, वाग्वैभव और तरलता को ज्यों-का-त्यों हम तक लेकर आए हैं इस अनूठी पुस्तक में। संवाद दो कवियों का परस्पर मिलना भी है और खुलना भी। वे जीवन-संग्राम से बच नहीं रहे, उसी में रहते हुए रच रहे हैं। पंकज चतुर्वेदी की युवा उत्कंठाओं को पहचानते हुए आलोकधन्वा उन्हें अपने सृजन-कक्ष की मेज़ तक ले जाकर दिखा देते हैं और कहते हैं, “अच्छे लोग वही हुए, जो अन्याय के ख़िलाफ़ लड़े, उनसे ख़ूबसूरत कोई नहीं है।” एक ऐसे समय में, जब संवाद मन्थर पड़ रहा है, ‘आँसू और रौशनी’ के प्रकाशन का स्वागत है। —ममता कालिया, कथाकार


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  • 9788119159185
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