इस पुस्तक में मूलतः दो विषयों पर चर्चा है। (1). आत्मसुरक्षा (2). बौद्ध ही श्रेष्ठ । पहला विषय मन से सम्बन्धित है, दूसरा शरीर से। दोनों के अलग-अलग विज्ञान हैं, स्वभाव हैं, धम्म हैं। जैसा जिस विषय का स्वभाव होगा, समाधान भी उसी के अनुरूप ही होगा। मनुष्य का मन कैसे बलवान किया जा सकता है, और कैसे उसे गिराया जा सकता है, हतोत्साहित किया जा सकता है, यह मन के विज्ञान को समझ कर ही किया जा सकता है। मन को बार-बार यह दोहराने से कि तू नीच है, दलित है, अछूत है, गिरा हुआ है, शूद्र है, पिछड़ा हुआ है, वह वैसा ही हो जाएगा। जब व्यक्ति (मन) स्वयं ही स्वीकार कर लेगा कि हां मैं नीच ही हूं, तब उसके अचेतन मन में यह संस्कार निर्मित होकर जड़ जमा लेगा, कि मैं अब कभी भी श्रेष्ठ नहीं हो सकता।
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